सखियों के श्याम -33 (अंतिम भाग)
🌹 कहा कहूँ कुछ कहत न आवे 🌹
'उधो जू! तुम चाहे कुछ कहो, तुम्हारे ये उपदेश हमारी समझ से परे हैं।' ललिता जू ने कहा- 'जो उनके मुख नहीं होता तो वे हमारे घर का माखन बरबस चुरा चुराकर कैसे खाते ? पाँव नहीं है तो गायों के संग कौन वन वन भागा फिरता था ? आँखें नहीं तो जिन आँखों में काजल आँजा करती थी मैया, वे क्या थी? बिना हाथ गोबर्धन उठाया वह हाथ किसके थे ? बिना मुख के कैसे बाँसुरी बजायी ? आह, सामने बीता है और तुम उस झुठलाना चाहते हो ? उनकी लीलायें, उनका स्वर, उनका रूप सब कुछ हमारे रोम-रोम में बस गया है; वह सब झूठ था ? हमारा भ्रम था ? नहीं उधोजू! वह नंद यशोदा के पुत्र और हमारे व्रज के नाथ हैं। तुम कैसे भी बनाकर कहो यह बात कभी हमारे गले नहीं उतरेगी।
"अरी सखी! यामें ऊधो जू कहा करें बिचारे, इन्हें तो उन चतुर सिरोमणि ने सिखाकर भेजा है। ये तो शुक की भाँति सीखा हुआ ही बोल रहे हैं।'—एक सखी ने कहा।
'तुम कहते हो 'गुण-ही-गुण में बरतते हैं, वे गुण रहित है।' श्रुति बोली- ' तो कहो श्याम सखा ! गुण आये ही कहाँ से ? भला बिना बीज के कहीं वृक्ष उपजा है? क्या उन्हीं के गुणों की परछाहीं माया की आरसी में दिखायी नहीं देती ? जल और लहरों की भाँति जगत क्या उनसे कुछ भिन्न है ? जिन वेदों की बात समझाने आये हो वे क्या उनके श्यामरूप नहीं ? कर्म के मध्य कभी किसी ने पाया? जिसने भी पाया प्रेम से ही पाया है। सूर्य, चन्द्र, धरा, गगन, जल और अग्नी; इन सबकी शक्ति — इनका प्रेरक वहीं नहीं है? जगत के सारे गुण नश्वर हैं और तुम्हारे अच्युत वासुदेव इनसे भिन्न है ? अरे ओ ज्ञानगंगा में नहावनिहारे महाराज ! प्रकट सूर्य को छोड़कर तुम परछाहीं की पूजा करते हो, जैसे हथेली पर धरे आँवले में तुम्हें ब्रह्म ही दिखायी देता है? हमें तो उस मदनमोहन रूप के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं सुहाता।'
श्रुति के कहते-कहते ही हमारी आँखों के सामने श्यामसुंदर का वह भुवनमोहन रूप छा गया। कहाँ उद्भव और कैसे उनके उपदेश; कुछ भी स्मरण नहीं रहा। सखियाँ व्याकुल हो एक स्वर से रुदन करती हुई पुकार उठीं- 'हा नाथ ! हा रमानाथ ! यदुनाथ! हमारे स्वामी ! ओ नंदनंदन ! तुम्हारे बिना – यह देखो तुम्हारी गायें कैसी भटकती फिर रही है ? क्यों नहीं इन्हें सम्हालते ? हम दुःख सागर में डूबकर बिलख रही है; क्यों नहीं अपने अजानुभुज बढ़ाकर-हमें अवलम्ब देकर सुखी करते ?' कोई कह रही थी—'अहा श्यामसुन्दर ! तुम तो किसी को दुःखी नहीं देख सकते थे, फिर दर्शन देकर क्षणभर में ही छिप जाना हमारी प्यास बुझ भी न पायी कि अंतर्धान हो जाना, यह छल विद्या तुम्हें किसने सिखायी ? हम तो तुम्हारे प्रेम, रूप और गुणों के आधीन हैं। कहो तो, बिना जल के मत्स्य कैसे जी पायेगी ?"
कोई कहती थी— 'अहो, कान्ह जू! अपनी बंसी की मधुमय तान सुनाकर, दर्शन देकर हमें जीवन प्रदान करो तुम्हारे हम सी बहुत होंगी किंतु श्याम जू! हमारे तो एक तुम ही अवलम्ब हो बहुत होने से ही क्या यों प्रीत तोड़ दोगे? इस प्रकार दूर दूर रहकर हृदय के घावोंपर नमक मत लगाओ।'
कोई कहती..
'यदि हम मर गयी तो सोचो कितना बड़ा कलंक तुम्हारे माथे लगेगा ? इसका भी तुम्हें डर नहीं है? अबला-वध के भय से तो बड़े-बड़े बलवान भी काँप जाते हैं।'
कोई कहने लगी- 'अहो श्याम ! ऐसे ही मारना था तो गोबर्धन उठाकर हमारी रक्षा क्यों की ? नाग से, दावाग्नि से क्यों बचाया हमें? अब उस विरहाग्नि में हँस-हँसकर जला रहे हो । प्रियवर! हमारा चित हमारे हाथ में नहीं है, इसी से इतनी निष्ठुरता क्या तुम्हें बरतनी चाहिये ? "
कोई कहती- 'अरे ये सदा के निष्ठुर हैं, इन्हें कोई पाप नहीं लगता। ये स्वयं ही पाप-पुण्य के सिरजनहार है, फिर डर काहे का! जानती नहीं, दूध पिलाने आयी उस बेचारी पूतना के प्राण ही ले लिये जब छः दिन के शिशु थे तब ही इनके ऐसे लक्षण थे; अब तो कहने ही क्या ?'
किसीने कहा-'अरी सखी! अब की ही क्या कहती हो, यह तो इनका पुराना स्वभाव है। इन्होंने विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करने के लिये जाते समय पथ में मिली ताड़का को मार डाला था। जब ये मर्यादा पुरुषोत्तम रघुवंशी कुल प्रदीप थे। तुम इन्हें नारी वध का डर
क्या दिखाती हो, यह तो पहले भी नारी वधकर चुके हैं।'
कोई बोली- 'अरी बहिन! उस समय तो ये पूरी तरह स्त्रीजित स्त्रैण पुरुष थे। सीता के कहने में आकर शरणागत-रक्षण करनेवालों में श्रेष्ठ इन धर्मधुरीन शस्त्रधारी ने छलपूर्वक सूपर्णखा के अंग-भंग कर लोकलाज की भी परवाह नहीं की। उसका अपराध क्या था कहो तो; वह इनके त्रिलोक विमोहन रूप पर आसक्त हो गई, यही न? ऐसे की क्या बात करनी ?"
एक ने कहा- 'अरी बहिनों लोक-लाज गयी चूल्हे में, लोभ हू के पोत (जहाज) है ये। इनके गुण क्या सुनाऊँ तुम्हें; बलि राजा के समीप भूमि माँगने गये ये हमारे वनमाली। उसने अपना वचन निभाया, पर इन्होंने छलपूर्वक उसका सर्वस्व हथिया कर बाँध दिया। यही नहीं उसके सि रपर अपना पाँव रख दिया, कहो तो कैसा न्याय किया?'
दूसरी बोली – 'इन्हें क्या कहे? ऐसे चरित्र हैं इनके कि कहा नहीं जाता। परशुराम होकर परशु (कुल्हाड़ा) कंधे पर धरकर निकले और भूमि क्षत्रियहीन कर दी । अपराध एक का और दण्ड इतनों को - रक्त के पाँच कुंड भर दिये, उसी से अपने पितरों का तर्पण किया। इतना ही नहीं सखी! उस समय अपनी माता - जननी को भी मारने में नहीं हिचकिचाये। इनकी निष्ठुरता की सीमा नहीं है।'
किसी ने कहा- 'अरी हिरण्यकश्यप से इनका भला क्या झगड़ा था ? प्रह्लाद ने पिता के सामने बोलकर ढिठाई की, पिता ने उसको दंड देकर शिक्षा देनी चाही, इसमें भला क्या बुरा किया था। बीच में ही नरसिंह वपुधार के कूद पड़े और नखों से उसे फाड़ डाला, भला किस अपराध में।'
कोई बोली – 'अरे शिशुपाल का ही क्या दोष था ? बिचारा विवाह करने भीष्मक के यहाँ गया वर वेश धारण कर-बरात लेकर ये बीच में ही छल करके उसकी दुलहिन को इस प्रकार हर लाये जैसे भूखे के मुख से कोई ग्रास छीन ले। ये तो सदा के स्वार्थी है।'
उसी समय कहीं से एक भ्रमर उड़ता हुआ आया और गुंजन करता हुआ श्रीकिशोरी जू के चरणों को कमल समझकर बैठने का उपक्रम करने लगा। श्री जू भावाविष्ट-सी बोली- 'नहीं, मेरे पाँव न छुओ। तुम चोर हो, कपटी हो, श्यामसुंदर भी तुम्हारे ही समान कपटी हैं। क्या तुम उन्हीं के दूत बनकर आये हो ? क्या तुमने और तुम्हारे स्वामी, दोनों ने ही लज्जा बेच खायी है ? यहाँ गोपीनाथ कहलाते थे, यह नाम उन्हें रुचों नहीं; अतः अब कुबरी दासी के दास कहलाकर, उसकी झूठन खाकर यदुकुल को पावन किया। रे मधुप ! तू कान्ह कुँअर के क्या गुणगान करता है रे, उनके गुण हम भली प्रकार जानती है, तेरी चतुराई यहाँ नहीं चलेगी! अरे, तू भी उनसा ही है, भोली-भाली कलियों को मोहकर उनका रस ले उड़ जाता है, ऐसे ही तेरे नागर नंदकिशोर हैं। हमें तेरी बात नहीं सुननी, तू जा यहाँ से। तेरे स्वामी त्रिभंगी ठहरे, यहाँ भला उनकी जोड़ी की नारी कहाँ से मिलती ? मथुरा में बड़े भाग से त्रिवक्रा मिली, अब अच्छी जोड़ी जमी! रूप, गुण और शील, सब प्रकार से वह उनके अनुरूप है।'
"मधुकर! श्यामसुन्दर गुरु; और तू उनका शिष्य ! यह जोड़ी भी सब प्रकार से अनुरूप है, तुझे ज्ञान का पाठ पढ़ा-ज्ञान गठरी सिर पर देकर यहाँ भेज दिया, किंतु यहाँ व्रज में कोई तुम्हारा ग्राहक नहीं है, अतः पुनः रावरे पधारो। क्या कहते हो कि - तुम और तुम्हारे स्वामी साधु पुरुष हैं? तो तुम्हारे वहाँ के सिद्ध पुरुष कैसे होते होंगे भला? गुण को मिटाकर औगुण को ग्रहण करनेवाले उन मथुरावासियों से निर्गुण होकर ही मोहन क्यों नहीं व्यवहार करते ?"
'अहो मधुप ! जगत में जितने भी काले देखे, सबके सब कपटी और कपट की खान पाये हमने एक श्याम जू के स्पर्श से आजतक तन-मन जल रहे हैं। ऊपर से मानो यह पीड़ा थोड़ी थी कि तुम सा काला भुजंग और भेज दिया। तुम दोनों कितने एक समान हो, यह तो आरसी में मुख देखते ही तुम्हें ज्ञात हो जायेगा । अरे ओ आलिंद ! यह कैसा न्याय है कि हम प्रेमियों के लिये ज्ञान, मुद्रा, वैराग्य और योग की भेंट भेजी, ऐसा करते हुए उनका हृदय तनिक भी काँपा नहीं ?' – कहते हुए श्रीकिशोरीजी के साथ समवेत स्वर में सभी सखियाँ बिलखकर रो उठी-‘हा नाथ! केशव! कृष्ण! मुरारी! तुम तो करुणामय हो, यह कैसी करुणा है तुम्हारी ?'
उनकी व्याकुलता देखकर मुझ से रहा न गया— 'ऊधो जू! तुम्हारे वे यदुनाथ, वासुदेव और देवकीनन्दन यहाँ व्रज में क्या इनके प्राण लेने ही पधारे थे? क्यों नहीं वहीं मथुरामें बने रहें ? यहाँ नंदनंदन, यशोदानंदन, गोपाल, गोविंद व्रजवल्लभ, गोपीनाथ होने क्यों आये ? जब अन्त में उन्हें मथुरा ही प्यारी थी तो क्यों हमसे नेह बढ़ाया। अरे! तुम उनके कितने गुण गाओगे, जो जन्म लेते ही छल-विद्या में पारंगत हो गया। उसने हमारे जले पर नौन लगाने भेजा तुम्हें योग लेकर ?'
'अहा स्याम जू, तुमने भली करी ! इन प्रेममूर्तियों को देनेके लिये भला पास था ही क्या? ऊधो, तुम भी बज्र का हृदय लेकर ही आये.... आह ! '
इन प्रेम स्वरूपाओं के अगाध नेह की, प्रयत्न करने पर भी मुझे थाह न मिली। जितना गहरा उतरता था, उतना ही इनके हृदय का प्रेम सागर अगाध जान पड़ता था। नित्य ही मैं भिन्न-भिन्न प्रकार से ज्ञान-योग समझाने का प्रयत्न करता, किंतु इनके प्रेम की विरह की तीव्र धारा में मेरा ज्ञान और मैं दोनों ही बह जाते।
आज श्री जू और चम्पा के उद्गारों ने मुझे सर्वथा निरस्त कर दिया। अहो, इनके दर्शन पाकर मैं धन्य हुआ। आजतक ज्ञान कर्म की निरस भूमिका बाँधता रहा, इन प्रेममयी के सम्मुख जिन्होंने धर्म और मर्यादा की मेंड़ लाँघ दी। इस प्रकार जो टूटकर प्रभु को चाहें, तो उनके सम्मुख जोग, ज्ञान और कर्म हीरे के सामने काँच के समान ही तो होंगे। ये गोपिकायें धन्य हैं इतने समय तक मैं ज्ञानमद की व्याधि से पीड़ित मरता रहा ।
विधाता! यदि मैं इनके मार्ग की धूरि बन सकूँ, तो इनके पदस्पर्श का सौभाग्य पा धन्य हो जाऊँ । यदि विधाता मुझे इस व्रज में लता, गुल्म अथवा दुर्वा ही बना दें, तो आते-जाते इनकी परछाँही और पवन के संयोग से इनकी चरण धूलि मुझ पर पड़ जाय; इनकी कृपा से तनिक-सा प्रेम मैं भी पा सकूँ तो मेरा कल्याण हो जाय; किंतु यह भी तो मेरे वश की बात नहीं है। यदि श्यामसुंदर प्रसन्न हो जाय तो उनसे यही वर माँग लूँगा। प्रभु की महती कृपा है कि संदेश के मिस मुझे यहाँ प्रेम-पाठ पढ़ने पठाया अन्यथा मुझ मूढ़ के भाग्य में प्रेमानंद कहाँ ?
जय जय श्री राधेश्याम
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जय जय श्री राधे ! श्री वृंदावन !


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